Tuesday, February 21, 2017

Environmental Pollution: Types and Control Measures - Part 2

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पर्यावरण-प्रदूषण : प्रकार और नियंत्रण के उपाय भाग - 2

📙 पर्यावरण-प्रदूषण : प्रकार और नियंत्रण के उपाय भाग - 2 📙

🎷🎷3. ध्वनि प्रदूषण (Sound Pollution)🎧🎧

  • इसे शोर प्रदूषण भी कहते हैं। अवांछित ध्वनि (Unwanted Sound) को शोर कहते हैं। आजकल वैज्ञानिक प्रगति के कारण मोटर गाड़ियों, स्वचालित वाहनों, लाउडस्पीकरों, टैक्टरों, कल-कारखानों एवं मशीनों का उपयोग काफी अधिक होने लगा है। ये सभी उपकरण एवं मशीनें काफी आवाज (शोर) करते उत्पन्न करती हैं। मनुष्य की श्रवण क्षमता 80 डेसिबल होती है।

शोर की तीव्रता (Intensity of Noise)- 

  • शोर की तीव्रता का मापन डेसिबल की इकाई में किया जाता है। (1 डेसिबल- 1/10 बेल)।
  • शोर ध्वनि का वह रूप होता है, जिसे हम सहन नहीं कर पाते। मनुष्य 0 डेसिबल तीव्रता की आवाज को सुनने में सक्षम होता है। 25 डेसिबल पर शांति का वातावरण होता है। 80 डेसिबल से अधिक शोर होने पर मनुष्य में अस्वस्थता आ जाती है या बेचैनी होने लगती है तथा 130-140 डेसिबल का शोर अत्यंत पीड़ादायक होता है। इससे अधिक शोर होने पर मनुष्य में बहरा होने का खतरा होता है। ध्वनि प्रदूषण के कारण व्यक्ति अनिद्रा, सिरदर्द, थकान, हृदय रोग, रक्तचाप आदि का शिकार हो जाता है। किसी व्यक्ति के लगातार 8 घंटे तक 80-90 डेसिबल की ध्वनि में रहने से उसमें बहरापन शुरू हो जाता है।

🎺धवनि प्रदूषण के स्रोत (Sources of Noise Pollution)- ध्वनि प्रदूषण उत्पन्न करने वाले प्रमुख स्रोत निम्न हैं-🎷

  1. सभी स्वचालित वाहन जैसे-बस, ट्रक, स्कूटर, मोटर साइकिल, ट्रेन आदि।
  2. स्वचालित कारखानें- इनमें काम करने वाले कर्मचारी ध्वनि प्रदूषण के शिकार हो जाते हैं। इनमें प्रमुख प्रदूषक-कपड़ा, इस्पात, स्कूटर, मोटर कार, सीमेंट बनाने के कारखाने आदि।
  3. वायुयान, राकेट, हेलीकाप्टर, हवाई जहाज, जेट विमान आदि। इनकी उड़ान के समय अत्यधिक ध्वनि उत्पन्न होती है, जिससे जन-जीवन ध्वनि प्रदूषण के शिकार हो जाते हैं।
  4. एटम बमों, डायनामाइटों, आतिशबाजी, पटाखे, बंदूकों के चलने एवं युद्ध के दौरान हुए विस्फोटों से ध्वनि प्रदूषण होता है।
  5. लाउडस्पीकर, टेलीविजन, अन्य ध्वनि विस्तारक यंत्र भी ध्वनि प्रदूषण के स्रोत हैं।
  6. स्वचालित वाहनों में विभिन्न प्रकार के हॉर्न।
  7. आटा चक्की, कूलर, एक्जॉस्ट पंखे, राइस मील, मिक्सी, ग्राइंडर आदि भी ध्वनि प्रदूषण के स्रोत हैं।

🏗🎧धवनि प्रदूषण के प्रभाव (Effects of Noise Pollution)- 🎧धवनि प्रदूषण से हमारे शरीर मे निम्नलिखित प्रभाव दिखाई देते हैं- 

  1. अधिक शोर के कारण सिरदर्द, थकान, अनिद्रा, श्रवण क्षमता में कमजोरी, चिड़चिड़ापन, उत्तेजना, आक्रोश आदि रोग उत्पन्न होने लगते हैं।
  2. शोर प्रदूषण के कारण उपापचयी प्रक्रियाएं प्रभावी होती हैं। संवेदी एवं तंत्रिका तंत्र कमजोर हो जाता है। मस्तिष्क तनाव ग्रस्त हो जाता है तथा हृदय की धड़कन और रक्तचाप बढ़ जाता है। पाचन क्रिया कमजोर हो जाती है।
  3. एड्रीनल हार्मोन का स्राव भी बढ़ जाता है। धमनियों में कोलेस्ट्रोल का जमाव होने लगता है। जनन क्षमता कम हो जाती है आदि।
  4. अत्यधिक तेज ध्वनि से मकानों में दरार आने की संभावना बढ़ जाती है।

ध्वनि प्रदूषण पर नियंत्रण (Controlling of Noise Pollution)- ध्वनि प्रदूषण को कम करने के लिए निम्नलिखित उपाय हैं-

  1. लोगों मे ध्वनि प्रदूषण से होने वाले रोगों से परिचित करा उन्हें जागरूक बनाना चाहिए।
  2. कम शोर करने वाले मशीनों-उपकरणों का निर्माण एवं उपयोग किए जाने पर बल देना चाहिए।
  3. अधिक ध्वनि उत्पन्न करने वाले मशीनों को ध्वनिरोधी कमरों में लगाना चाहिए तथा कर्मचारियों को ध्वनि अवशोषक तत्वों एवं कर्ण बंदकों का उपयोग करना चाहिए।
  4. उद्योगों एवं कारखानों को शहरों या आबादी से दूर स्थापित करना चाहिए।
  5. वाहनों में लगे हार्नों को तेज बजाने से रोका जाना चाहिए।
  6. शहरों, औद्योगिक इकाइयों एवं सड़कों के किनारे वृक्षारोपण करना चाहिए। ये पौधे भी ध्वनि शोषक का कार्य करके ध्वनि प्रदूषण को कम करते हैं।
  7. मशीनों का रख-रखाव सही ढंग से करना चाहिए।

4.मृदा प्रदूषण (Soil Pollution)

  • मृदा पृथ्वी की सबसे ऊपरी उपजाऊ परत होती है, जिस पर पौधे उगते हैं। पौधों के लिए यह मृदा अत्यधिक आवश्यक होती है, क्योंकि पौधे मृदा से ही जल एवं खनिज लवणों का अवशोषक करते हैं। शहरीकरण, औद्योगीकरण एवं जनसंख्या वृद्धि के कारण इनके अनुपयोगी पदार्थों ने मृदा को प्रदूषित कर दिया है। इनके कारण मृदा की उपजाऊ शक्ति कम होती जा रही है तथा उसमें रहने वाले जीव-जंतुओं पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। विभिन्न प्रकार के उर्वरक एवं कीटनाशक दवाइयां मृदा को प्रदूषित कर रहे हैं।

मृदा प्रदूषण के प्रमुख स्रोत (Main Sources of Soil Pollution)- मृदा को प्रदूषित करने वाले प्रमुख स्रोत निम्नानुसार हैं-

  1. घरेलू एवं औद्योगिक कूड़ा-करकट एवं अपशिष्ट पदार्थ।
  2. उर्वरक, कीटनाशक दवाइयां, खरपतवारनाशक, अम्लीय जल वर्षा, खानों से प्राप्त जल आदि।
  3. भारी धातुएं जैसे- कैडेमियम, जिंक, निकिल, आर्सेनिक कारखानों से मृदा में मिल जाते हैं।
  4. अस्थियां, कागज, पोलीथिन, सड़ा-गला मांस, सड़ा हुआ भोजन, लोहा, लैंड, तांबा, पारा आदि भी मृदा को प्रदूषित करते हैं।
  5. खेतों में मल-मूत्र त्यागने के कारम भी मृदा प्रदूषित हो जाती है।

📗मदा प्रदूषण पर नियंत्रण (Control Soil Pollution)- मृदा को प्रदूषित होने बचाने के लिए हमें निम्नलिखित उपाय करने चाहिए-📗

  1. मृत प्राणियों, घर के कूड़ा-करकट, गोबर आदि को दूर गड्ढे में डालकर ढक देना चाहिए। हमें चाहिए कि खेत आदि में शौच कार्य न करें।
  2. मकान व भवन को सड़क से कुछ दूरी पर बनाना चाहिए। मृदा अपरदन को रोकने के लिए आस-पास घास एवं छोटे-छोटे पौधे लगाना चाहिए। घरों में साग-सब्जी को उपयोग करने के पहले धो लेना चाहिए।
  3. गांवों में गोबर गैस संयंत्र अर्थात् गोबर द्वारा गैस बनाने को प्रोत्साहन देना चाहिए। इससे ईंधन के लिए गैस भी मिलेगी तथा गोबर खाद।
  4. ठोस पदार्थ अर्थात् टिन, तांबा, लोहा, कांच आदि को मृदा में नहीं दबाना चाहिए।

5. रेडियोंधर्मी प्रदूषण (Radioactive Pollution)

  • ऐसे विशेष गुण वाले तत्व जिन्हें आइसोटोप कहते हैं और रेडियोधर्मिता विकसित करते हैं, का वातावरण में फैल जाना, जिससे मानव जीव-जंतु, वनस्पतियों एवं अन्य पर्यावरणीय घटकों के हानि होने की संभावना रहती है, को नाभिकीय प्रदूषण या ‘रेडियोधर्मी प्रदूषण’ कहते हैं।

📗रडियोधर्मी प्रदूषण के स्रोत (Sources of Radioactive Pollution)- रेडियोधर्मी प्रदूषण के स्रोत को हम दो भागों में बांट सकते हैं-

📕1. प्राकृतिक स्रोत (Natural Sources) – प्राकृतिक स्रोत के अंतर्गत निम्नलिखित स्रोत आते हैं-📕

  • आंतरिक किरणें,
  • पर्यावरण (जल, वायु एवं शैल),
  • जीव-जंतु (आंतरिक)।

2. मनुष्य निर्मित स्रोत (Man Made Sources) मानव निर्मित स्रोत के अंतर्गत निम्नलिखित स्रोत आते हैं-

  • रेडियो डायग्नोसिस (Radio Diagnosis) एवं रेडियोथेरेपिक (Radio Therepeutic) उपकरण,
  • नाभिकीय परीक्षण (Nuclear text)
  • नाभिकीय अपशिष्ट (Nuclear Waste)
  • नाभिकीय पदार्थों का अनुसंधान औषधि एवं उद्योग में उपयोग ं भी पड़ता है। इसके साथ-ही-साथ समुद्री जीवों पर भी प्रभाव पड़ता है।

रेडियोधर्मी प्रदूषण का नियंत्रण (Control of Radioactive Pollution)- रेडियोधर्मी प्रदूषण को रोकने के निम्नलिखित उपाय हैं-

  • परमाणु ऊर्जा उत्पादक यंत्रों की सुरक्षा करनी चाहिए।
  • परमाणु परीक्षणों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।
  • गाय के गोबर से दीवारों पर पुताई करनी चाहिए।
  • गाय के दूध के उपयोग से रेडियोधर्मी प्रदूषण से बचा जा सकता है।
  • सरकारी संगठनों एवं गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से जनजागरण करना चाहिए।
  • वृक्षारोपण करके रेडियोधर्मिता के प्रभाव से बचा जा सकता है।
  • रेडियोधर्मी पदार्थों का रिसाव सीमा में हो तथा वातावरण में विकिरण की मात्रा कम करनी चाहिए।

6. तापीय प्रदूषण (Thermal Pollution)

  • ऊर्जा के प्रमुख साधनों में एक ऊर्जा है ताप-ऊर्जा। ताप ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए सामान्यतः कोयले को जलाया जाता है, जिससे उत्पन्न ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदल दिया जाता है। लेकिन इस प्रक्रिया में में जब कोयले को जलाया जाता है तो इससे बहुत-सी ऐसे गैसें निकलती हैं, जो वातावरण को प्रदूषित करती हैं। ये गैसें प्रमुख रूप से कार्बन मोनोऑक्साइड, फ्लाइऐश, सल्फर एवं नाइट्रोजन के ऑक्साइड तथा हाइड्रोकार्बन इत्यादि होते हैं, इनका सांद्रण वातावरण में बढ़ता है और प्रदूषण फैलाते हैं, इसे ही ताप प्रदूषण कहते हैं।
  • ताप प्रदूषण हमारे वातावरण में उपयोग के पश्चात कुछ पदार्थों से ऊष्मा उत्पन्न होती है, जिसके कारण पर्यावरण का ताप बढ़ जाता है, इसे ही तापीय प्रदूषण कहते हैं। ताप विद्युत संयंत्र सामान्यतः तापीय प्रदूषण के प्रमुख कारण होते हैं।

विद्युत केंद्रों से कोयले की खपत से निकलने वाले प्रदूषण कारक पदार्थ-

1.कार्बन मोनोऑक्साइड- 

  • तापीय प्रदूषण के कारण कार्बन मोनोऑक्साइड वायुमंडल में पहुंचकर हानिकारक प्रभाव छोड़ता है, जिसके कारण हाइपोक्सिया (Hypoxia) नामक रोग उत्पन्न होता है।

2.हाइड्रोकार्बन- 

  • विभिन्न वाहकों में ईंधन के रूप में उपयोग किए जाने वाले सभी पदार्थों में हाइड्रोकार्बन होते हैं। इनके जलने से वातावरण में गर्म गैसें निकलती हैं, जिससे वातावरण का तापमान बढ़ जाता है। इसका प्रभाव त्वचा पर पड़ता है, जिससे त्वचा रोग एवं त्वचा कैंसर का भय रहता है।

3. प्लाई ऐश- 

  • औद्योगिक संस्थानों से निकली हुई गैसों के साथ जले हुए ईंधन इत्यादि के कण होते हैं, जो वायु में उड़ते रहते हैं, इन्हें प्लाई ऐश कहते हैं। ये गर्म होते हैं तथा वातावरण के तापमान को बढ़ा देते हैं, जिससे पेड़-पौधे वनस्पति आदि पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

4. सल्फर एवं नाइट्रोजन के ऑक्साइड- 

  • कोयले के जलने से सल्फर डाइऑक्साइड नामक गैस निकलती है। यह गैस कुल उत्सर्जित गैस का 75 प्रतिशत होती है। एक अनुमान के अनुसार पूरे विश्व में प्रतिवर्ष 10 के पावर 9 मिलियन टन सल्फर डाइऑक्साइड वातावरण में पहुंचती है। हमारे देश में एन.टी.पी.सी. ने कोयले का उपयोग बहुत तेजी से बढ़ाया है। सन् 1950 में 35 मिलियन मिट्रिक टन कोयला उपयोग होता था, जो 2000 में बढ़कर 240 मिलियन टन हो गया। सल्फर डाइऑक्साइड का प्रभाव आंखों एवं श्वसन तंत्र पर पड़ता है, इसके साथ-ही-साथ पुरातात्विक महत्व के अवशेषों को बहुत नुकसान उठाना पड़ता है।

5. एल्डिहाइड्स- 

  • तापरहित विद्युत केंद्रों में नाइट्रोजन के ऑक्साइड का भी उत्सर्जन होता है, इनमें नाइट्रस ऑक्साइड, नाइट्रिक ऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड प्रमुख हैं। ये वातावरण को प्रभावित कर विभिन्न रोगों को जन्म देते हैं।

प्रभाव- 

  • ताप प्रदूषण से पर्यावरण, पौधे जीव-जंतु की जैविक क्रियाएं, मनुष्य के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

📗ताप प्रदूषण को रोकने के उपाय - ताप प्रदूषण को रोकने के निम्न उपाय हैं-📗

  • तापशक्ति केंद्रों से निकलने वाले अनुपयोगी पदार्थों का समुचित उपयोग होना चाहिए।
  • तापशक्ति केंद्रों की गैसों का पुनः अन्य कार्यों में उपयोग होना चाहिए।
  • इन केंद्रों में कार्यरत कर्मचारियों को प्रदूषण की जानकारी देते हुए उससे बचने के उपाय बताना चाहिए।
  • वाहनों में उचित मापदंड के अनुसार ईंधन भरना चाहिए।

💦📙7. समुद्रीय प्रदूषण (Marine Pollution)📙

  • पृथ्वी का 71 प्रतिशत भाग जल है। कुल जल का 97.25 प्रतिशत भाग समुद्र के रूप में पाया जाता है। इसमें 3.5 प्रतिशत घुलित पदार्थ पाए जाते हैं।

परिभाषा- 

  • समुद्र में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ऐसे पदार्थों का मिलना, जिसके कारण हानिकारक प्रभाव उत्पन्न हो सके, जिससे मनुष्य जीव-जंतु पर संकट उत्पन्न हो और समुद्र की गुणवत्ता पर प्रभाव पड़े तो इसे समुद्रीय प्रदूषण कहते हैं।
  • नदियों द्वारा लाए गए अधिक मात्रा में वाहित मल, कूड़ा-कचरा, कृषिजन्य कचरा, भारी धातुएं, प्लास्टिक पदार्थ, पीड़कनाशी, रेडियोधर्मी पदार्थ, पेट्रोलियम पदार्थ इत्यादि के समुद्र में आने से समद्रीय वातावरण
  • (Marine Atmospher) प्रदूषित हो जाता है, इसी को हम समुद्रीय प्रदूषण (Marine Pollution) कहते हैं।

समुद्रीय प्रदूषण के स्रोत (Source of Marine Pollution)- समुद्रीय प्रदूषण के निम्नलिखित स्रोत हैं-

1.घरेलू अपशिष्ट- 

  • नदी, नालों के द्वारा घरेलू अपशिष्ट समुद्र तक पहुंच जाते हैं।

2.औद्योगिक बहिःस्राव- 

  • प्रायः सभी उद्योग कार्बनिक या अकार्बनिक पदार्थ, अनुपयोगी डिटरजेंट्स, पेट्रोलियम, कार्बोनेट्स, सायनाइड्स आर्सेनिक, कॉपर, फर्टीलाइजर आदि नदी में छोड़ दिए जाते हैं, जो समुद्र में पहुंच जाते हैं।

3.रेडियोधर्मी कचरा- 

  • जहां रेडियोधर्मी स्टेशन हैं, वहां के आस-पास के समुद्र में अनुपयोगी रेडियोधर्मी पदार्थ छोड़ दिए जाते हैं।

4.तेल प्रदूषक- 

  • कभी-कभी लापरवाहीवश तेलीय पदार्थ समुद्री रास्ते से ले जाते समय समुद्र तट में आ जाते हैं। कभी-कभी कारखानों से भी अनुपयोगी तेल समुद्र में डाल दिए जाते हैं।

5. कृषिजन्य कचरा- 

  • बहुत से कीटनाशक वर्षा के कारण खेतों से नदी में तथा नदी से समुद्र में आ जाते हैं।

समुद्री प्रदूषण से होने वाले प्रभाव- समुद्री प्रदूषण से होने वाले प्रभाव निम्न प्रकार हैं-

  • समुद्री प्रदूषण से समुद्र के जीव-जंतु, समुद्रीय वनस्पतियां प्रभावित होती हैं।
  • कीटनाशकों के समुद्र में आ जाने से जलीय जंतु तथा उनके अंडे प्रभावित होते हैं।
  • तेल के कारण प्रकाश और ऑक्सीजन की कमी से जीव-जंतु, वनस्पतियों में बुरा असर पड़ता है। ऐसा अनुमान है कि 50000 से 200000 समुद्री जंतु तेल के कारण मर जाते हैं।

📗समुद्रीय प्रदूषण की रोकथाम- समुद्री प्रदूषण की रोकथाम के निम्न उपाय हैं-📗

  • घरेलू अपशिष्ट, औद्योगिक बहिःस्राव, रेडियोधर्मी पदार्थ आदि को किसी भी प्रकार से समुद्र में नहीं जाना चाहिए। इनकी व्यवस्था पास ही किसी दूरी पर कर देनी चाहिए।
  • टैंकरों, पाइपलाइनों, तेल परिवहनों आदि से रिसाव को रोकना चाहिए.
  • कृषिजन्य कचरा जो रासायनिक पदार्थ होते हैं, उन्हें नदी के बहाव के पूर्व रोक देना चाहिए, ताकि वे समुद्र तक न पहुंच सकें। आदि।
  • औद्योगिककरण, शहरीकरण अवैध खनन, विभिन्न स्वचालित वाहनों, कल-कारखानों, परमाणु परीक्षणों आदि के कारण आज पूरा पर्यावरण प्रदूषित हो गया है। इसका इतना बुरा प्रभाव पड़ा है कि संपूर्ण विश्व बीमार है। पर्यावरण की सुरक्षा आज की बड़ी समस्या है। 
  • इसे सुलझाना हम सब की जिम्मेदारी है। इसे हमें प्रथम प्राथमिकता प्रदान करना चाहिए तथा पर्यावरण की सुरक्षा में सहयोग देना चाहिए।

💐*“स्वच्छ पर्यावरण आज की जरूरत है, पर्यावरण निरोग तो हम निरोग।”*💐

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