NSG (न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप)?

क्या है ये NSG (न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप)?

न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप 48 देशों का एक समूह है जो दुनिया में न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी और न्यूक्लियर मटेरियल के खरीद-बेच को कंट्रोल करता है. दुनिया में बहुत कम देशों के पास ये टेक्नोलॉजी और मटेरियल है. जरूरत सबको है. क्योंकि इससे सबकी बिजली-बत्ती का इंतजाम हो जायेगा. प्रदूषण भी कम होगा. तेल बेचने वालों की दादागिरी भी कम होगी.

जब इतने उत्तम विचार हैं फिर दिक्कतें कहाँ से आईं?

दिक्कत तो हमने ही शुरू की थी. मतलब भारत ने. आज़ादी के बाद यूँ था कि हमारे पास न्यूक्लियर मटेरियल के रूप में बहुत ज्यादा थोरियम और थोड़ा सा यूरेनियम था. थोरियम को डायरेक्ट न्यूक्लियर प्लांट में यूज नहीं कर सकते. यूरेनियम को कर सकते हैं. प्लान था कि 40 -50 साल में धीरे-धीरे थोरियम को यूरेनियम में बदलने की तकनीक लाएंगे और अपना कार्यक्रम दुरुस्त कर लेंगे. रूस से हमने हेल्प ली और अपने न्यूक्लियर रिएक्टर लगाने शुरू कर दिए. जो भी हमारे पास यूरेनियम था उसी से. थोड़ा बहुत इधर-उधर से ले लिया.

फिर पाकिस्तान से और चीन से हमारी लड़ाई हो गई. दिक्कत हो गई. बस हमने ‘परमाणु-परीक्षण’ कर लिया. मतलब जो हमारे पास था उसी से ‘न्यूक्लियर हथियार’ बना लिए. 1974 में. प्रोजेक्ट का कोड नाम रखा था- बुद्ध मुस्कुराये. सबके कान खड़े हो गए. तुरंत ‘न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप’ बनाया गया. ग्रुप बोला किसी को हमसे पूछे बगैर न्यूक्लियर मटेरियल नहीं मिलेगा.

NPT(नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी) ने दिक्कतें बढ़ा दी

न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में शामिल होने के लिए इस पर साइन करना जरूरी हो गया. पूरी दुनिया के देश धड़ाधड़ साइन मारने लगे. हमने नहीं मारा. अपना ऐटिट्यूड है. क्योंकि ये शर्त बहुत ही जालिम थी. 5 देश अमेरिका, चीन, फ्रांस, इंग्लैंड और रूस सब कुछ रखना चाहते थे. कि हथियार सिर्फ इनके पास रहे और बाकी लोग देखते रहें. हमने मना कर दिया. फिर उन्होंने भी मना कर दिया. नहीं देंगे सामान. ले लो टेक्नोलॉजी. अब नहीं लोगे? हमारा थोरियम-यूरेनियम वाला कार्यक्रम घिसटने लगा.

कुछ ख़ास हो नहीं रहा था. अमेरिका और बाकी न्यूक्लियर देशों की दादागिरी के बावजूद बिना एनपीटी पर साइन किये 1998 में हमने पोखरण में फिर परीक्षण कर दिया. अब तो आग ही लग गयी.

मिलेनियम बदला फिर हवाओं का भी रुख बदला

दुनिया के सारे देश नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी पर साइन कर चुके हैं. सिर्फ पांच देशों – भारत, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया, इजराइल और ईरान ने मना किया है. इन सबमें भारत का रिकॉर्ड बहुत अच्छा रहा है. हम किसी को धमकाते नहीं. पाकिस्तान धमकाता है. उत्तर कोरिया भी धमकाता है. ईरान किसी से पूछता नहीं. इजराइल किसी को कुछ बताता नहीं. हमने किसी को बेचा भी नहीं है. पाकिस्तान लीबिया को बेचते पकड़ा जा चुका है. हमारा उद्देश्य शुरू से यही रहा है- सबका साथ, सबका विकास. 2008 तक ये बात सबको समझ आ गई. अमेरिका तैयार हो गया कि न्यूक्लियर रिएक्टर बनाने में मदद करेंगे. नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी पर साइन करना जरूरी नहीं है. इस डील को सिविल न्यूक्लियर डील कहा गया.

फिर जापान ने अड़ंगा लगा दिया. क्योंकि रिएक्टर के कोर की टेक्नोलॉजी जापान से ही आती है. उनको भारत पर विश्वास नहीं है. जापान न्यूक्लियर हथियार का भुक्तभोगी देश है. उसको इग्नोर नहीं कर सकते. उधर चीन कहने लगा कि अगर भारत को मिलेगा तो पाकिस्तान को भी मिलना चाहिए. अब हम फिर फंस गए.

अब इस साल क्या हुआ है?

भारत ने लगातार सारे देशों से संपर्क साधा है. मोदी जी की हवाई यात्रायें काम आई हैं. न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप के कई देशों का सपोर्ट मिल चुका है इंडिया को. एक बैकडोर एंट्री की जगह है.

MTCR- ये मिसाइल टेक्नोलॉजी को कंट्रोल करता है.

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